पागलों को परवाह है देश की,और बुद्धिजीवी बेपरवाह हैं

कल मैं दिल्ली के बजीर पुर डिपो बस स्टैंड पर खड़ा देख रहा था  कि एक  पागल- सा युवक सड़क पर एक डंडा  लहरा कर दिल्ली सरकार का विरोध कर रहा है.लोग उस की बातों पर कोई ध्यान नहीं दे रहे थे . और देते भी क्यों वह एक पागल जो था .  वह कभी -२ जोश में आ कर डंडे को जोर से हवा में लेहरा  देता . वह चाहता था कि सरकार  जबाव दे कि वह अपने फायदों की परवाह न करते हुए,दिल्ली में शराब पर पूरी तरह से रोक क्यों नहीं लगा देती .वह चाहता था कि देश में जो गरीबों के उत्थान / विकास के लिए जो कार्यक्रम चलाये जा रहें हैं, उन में पारदर्शिता  आनी चाहिए तथा गरीबों को उन का  मिलाना चाहिए . और गरीबी विकास न हो कर  गरीबों का विकास होना चाहिए।क्यों कि गरीबों को राशन देनें से गरीब  विकास नहीं होगा। गरीबों को रोजगार व   जैसी सुविधा भी होनी चाहिए।यद्यपि मैं देख रहा था की उस के डंडे लहराने वाले कृत्य से सभी लोगों को असुविधा हो रही थी. मगर सब चुप चाप देख रहे थे ( याद  रहे सुन कोई नहीं रहा था  ) किसी को नहीं थी कि उस से मन करे कि उस को मन करे कि भाई तुम्हारे  डंडे लहराने वाले कृत्य से सभी लोगों को असुविधा हो रही है मगर शायद एक ही व्यक्ति था जो उसे सुन भी रहा था और देख भी रहा था . और सोच भी रहा था की देखो तो हमें जो देश के तथा कथित बुद्धिजीवी बने फिरतें हैं . जो चुपचाप बस अपनी बुद्धि  का उपयोग अपना जीवन काटनें में कर रहें हैं . और पागल /अर्ध विक्षिप्त लोग देश की परवाह कर रहा है.और अकेला ही आन्दोलन चला चला रहा रहा है .वह बात तो सही कर रहा है मगर पागल है और लोग उस की
 तरफ सिर्फ देख रहें हैं उन के कान बंद हैं . और जिन के कान  खुलें हैं वे अपनी बुद्धि के गुलाम हैं और कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं . वे जानतें हैं कि उस पागल की इन बातों का कोई मतलब  नहीं।
मगर  मैं सिर्फ इतना सोच रहा था कि -
१. क्या  हम सड़क पर हो रहे किसी भी प्रकार के ड्रामे को मूक दर्शक की भांति खड़े रहेंगे  या फिर उस को रोकने के लिए किसी प्रकार का कदम भी उठाएंगे।
२. आखिर कब तलक हम अपने देश में सिर्फ दिखाने के लिए बुद्धिजीवी बने रहेंगे ,और देश में,गाँव में ,सड़क  पर  होने वाली घटनाओं को "छोड़ो " कह कर होने देंगे। 

३. क्या हमें उस पागल से सीख नहीं मिलती कि  यार उस का क्या है वह तो पागल है वह तो किसी भी देश में कैसे भी रह सकता है ,मगर हमें तो शांति ,सुरक्षा चाहिए ,वह सब चाहिए जिस से आराम से जीवन कटे ज़ब वह पागल हो कर भी अन्याय के खिलाफ आवाज उठा सकता है हम क्यों चुपचाप रहतें हैं ?
   

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